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पश्चिम एशिया में बढ़ता संकट | Drishti IAS

पश्चिम एशिया में बढ़ता संकट

प्रकाशित तिथि: 06 मार्च 2026

यह लेख ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमलों और तेहरान द्वारा पूरे क्षेत्र में किये गए जवाबी हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तेज़ी से बढ़ते संघर्ष पर प्रकाश डालता है, जिसने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को बाधित करना शुरू कर दिया है。

प्रिलिम्स के लिये: पश्चिम एशिया, बाल्फोर घोषणा-पत्र, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी, IMEC
मेन्स के लिये: पश्चिम एशियाई संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भारत पर इसके आर्थिक प्रभाव。
West Asia Map

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संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • साइक्स-पिकोट और बाल्फोर (1916-1917): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोपीय शक्तियों द्वारा बनाई गई 'कृत्रिम सीमाओं' ने क्षेत्रीय विवादों की नींव रखी。
  • इज़रायल का गठन (1948): इसके कारण प्रथम अरब-इज़रायली युद्ध हुआ और 700,000 फिलिस्तीनी विस्थापित हुए (नक़बा)。
  • 1979 की इस्लामी क्रांति: इसने ईरान को इज़रायल के विरुद्ध 'प्रतिरोध की धुरी' का वैचारिक नेतृत्वकर्त्ता बना दिया。

वर्तमान संघर्ष के प्रमुख कारक

वर्तमान संकट की शुरुआत अमेरिका के 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और इज़रायल के 'ऑपरेशन लॉयन्स रोर' से हुई。 ईरान ने इसके जवाब में 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस IV' शुरू किया है。

प्रमुख पक्षों के हित (सामरिक तुलना)

पक्ष इज़रायल/अमेरिका ईरान/प्रतिरोध की धुरी
प्राथमिक लक्ष्य सत्ता परिवर्तन और परमाणु क्षमता कम करना शासन की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव
सामरिक बदलाव 'स्कॉर्पियन स्ट्राइक' (स्वायत्त ड्रोन) असममित प्रॉक्सी हमले

भारत पर प्रभाव

भारत के लिये यह संघर्ष अत्यंत संवेदनशील है:

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत के 40-50% कच्चे तेल का पारगमन होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होता है, जो अब खतरे में है。
  • प्रवासी सुरक्षा: खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीयों की सुरक्षा और उनसे मिलने वाला 38% प्रेषण (Remittances) जोखिम में है。
  • रणनीतिक परियोजनाएँ: IMEC और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएँ अस्तित्वगत गतिरोध का सामना कर रही हैं。

आगे की राह: भारत के लिये रणनीति

  1. विकेंद्रीकृत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विकास。
  2. 'ब्लू-वॉटर ट्रांज़िट कॉरिडोर' के माध्यम से नौसैनिक सुरक्षा प्रदान करना。
  3. डिजिटल वित्तीय शोधन और 'रुपये-स्वैप' हब की स्थापना。
  4. होर्मुज़-बाईपास के लिये INSTC मार्ग को प्राथमिकता देना。

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